समाजसेवा ने बिखेरे कर्मफल के सिद्धांत
समाजसेवा ने बिखेरे कर्मफल के सिद्धांत
रुतबे के आगे झुक जाती है समाजसेवा
जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - वैसे तो " जैसी करनी वैसी भरनी " कर्मफल के अटल सिद्धात है लेकिन परिवर्तनशील इस संसार के क्रिया फल मे कब अन्तर हो जायेगा कुछ कहा नही जा सकता । जिसका उदाहरण समाजसेवा के रास्ते तय होने वाला राजनैतिक सफर है जहां अपनी समाजसेवा के बूते लोग विषम परिस्थिति के हवाले हो जा रहे है वे चाह कर भी वह समाजसेवा नही कर पा रहे है जो कभी उनके रग - रग मे हुआ करता था आज वह सहानुभूति , भाईचारा , प्रेम बंधुत्व भूलने को विवश है ।
उल्लेखनीय है कि सत्कर्म रूप समाजसेवा का प्रतिफल राजनीति हो गया है जो लोग समाजसेवा के रथ पर आरूढ़ हो रहे है वो फल स्वरूप राजनीति की दुनिया मे चले जा रहे है । वहां जाकर वह वही कर रहे जो समाज सिद्धांत नही कहता है जिसका उदाहरण असमाजिकता के तौर पर बहुतायत रूप मे देखा जा सकता है । समाजसेवा के रास्ते राजनीति का जो सफर तय हो रहा है उसमे समाजसेवा का अभाव बड़े पैमाने पर हो रहा है । जो समाजसेवा पहले ढूढ़ कर किया जाता था अब वह मांगने पर भी नही किया जाता , इसकी पराकाष्ठा तब और कहानी सुना रही होती है जब कोई लाचार बेबस निराश होकर घर लौटता है ।