सेवा कोई वजह नही नैतिक जिम्मेदारी होती है - अब्दुल्ला खान
सेवा कोई वजह नही नैतिक जिम्मेदारी होती है - अब्दुल्ला खान
💠 आज कटुता का बोलबाला है इसके चलते हम इंसानी भूल रहा है हमसे एकता भाईचारा, प्रेम बंधुत्व दूर होते जा रहा है आधुनिक विकास की ललक हमसे हमारा हरा भरा वातावरण हमारा इंसानी गुण छीन ले रहा है जब हम एक छोटे गांव हरे भरे वातावरण और एकता भाईचारे मे जीवन यापन नही सकते तब हम पूरे देश की परिकल्पना कैसे कर सकते है 💠
साक्षात्कार
जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - जीवन व शिक्षा के प्राथमिक दौर से जीवन के गुजारा भत्ता के लिए संघर्षरत रीलेक्सो डोमस्वेयर कम्पनी तक का सफर करना अपने आप मे एक मिशाल तो है ही उन लोगो के जीवन उद्धेश्यो का भी यह ऐसा जीवंत उदाहरण है जो लोग अपराधिक कृत्य के हवाले जिन्दगी को कर देते है बूढ़े मां - बाप को घर से बाहर निकाल देते है आज कम्पनी निदेशक केवल सफल होकर सुखमय जिन्दगी के साथ जीवन ही नही जी रहे है बल्कि रोजी - रोजगार के साथ समाजिक कार्यो मे बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे है सहयोग , व्यवस्था , जागरूकता , सबलता पर भी काम कर रहे है जन्म स्थान गांव को जहां ग्रीन गांव बनाने का बीड़ा उठाकर मुफ्त दवाखाना का संचालन कर रहे है वही एक सुन्दर समाज के लिए गांव को आदर्श गांव बनाने की ओर अग्रसर हो रहे है । यही नही एकता - भाईचारे , प्रेम बंधुत्व का सीख देने वाले सूफी सन्त कबीर दास के महा निर्वाण स्थली मगहर मे सद्गुरु कबीर भोजन सेवा एवं वस्त्र दान सेवा को रोजाना का रूप देकर अकथनीय सहयोग कर रहे है । अपितु ऐसे मे बिना कोई उपाधि से नवाजे वगैर रोजी रोजगार से लेकर सेवा सहयोग का जीवन यापन कर रहे बतौर जरूरी कम्पनी निदेशक अब्दुल्ला खान से जी एल वेदांती का खास बातचीत के प्रमुख अंश ।
▪लोग गांव से शहर की ओर जाते ताकि उनका उनके परिवार का अच्छे से भरण पोषण हो सके । लेकिन यहां उल्टा हो रहा है शहर के बजाय कम्पनी गांव मे निवेश कर रही है ?
हां ! गांव मे निवेश को लेकर सवाल अच्छा है । शहर विकास का रूप होता है लेकिन आप प्राचीनकाल को देखेगे तो शहर का उल्लेख नही मिलेगा । जैसे - जैसे मानव सभ्यता शिखर पर आते गया , और हमारे रहन - सहन मे भी परिवर्तन आने लगे , तैसे - तैसे हम विकास को नये रूप मे देखने लगे है । गांव हमारे पिछड़ेपन का द्योतक है आज जब हम विकासशील आधुनिक युग मे जी रहे है तब हमारा गांव पिछड़ेपन मे क्यो रहे । इस उद्देश्य के साथ कम्पनी गांव मे आकर निवेश करने का काम रही है ।
▪चूंकि कम्पनिया निवेश पर निर्भर होती है उनका ध्यान केवल निवेश पर होता है लेकिन यहां निवेश के साथ लाभकारी विकासशील योजनाओ की तरह कम्पनी काम कर रही है ?
कम्पनियो को शहर से जोड़कर देखना मेरे हिसाब से मुनासिब नही है जहां तक मै समझता हूं कम्पनी का दूसरा नाम विकास होता है । गांव गांव ही रहे ऐसी सोच से हमे ऊपर उठकर काम करना चाहिए , कम्पनी वही काम कर रही है ।
▪कम्पनी के द्वारा समाजिक कार्य भी हो रहे है इसकी कोई खास वजह ?
[ हंसते हुए ] सेवा कोई वजह नही है यह तो नैतिक जिम्मेदारी है हम समाज को ऊपर लाने के लिए बहुत सारे कोशिश करते है अनेको रास्ते अख्तियार करते है नाते - रिश्ते , रीति - रिवाजो को बढ़ावा देते है पर मै समझता हूं सेवा से बढ़कर कोई और व्यवस्था नही है ।
▪जनपद कृषि प्रधान है मतलब अनाज से कोई परिवार खाली नही है ऐसे मे कम्पनी द्वारा सद्गुरु कबीर भोजन सेवा पर काम किया जा रहा है इसका कोई खास उद्देश्य ?
खास उद्देश्य ! भूख बोलकर नही आती है यह समय पर निर्धारित है कबीर मठ एक पुनीत स्थल है दूर दराज से यहां लोगो का रोजाना आना - जाना होता है दर्शन और उपदेशो को सुनने समझने मे समय लग जाता है ऐसे मे भोजन की व्यवस्था अति आवश्यक चीज है लोग कबीर साहब के निर्वाण स्थली से भूखे लौटे यह अच्छा नही है । किसी भी मठ की सुव्यवस्था वहां की गरिमा को और बढ़ाने का काम करता है उसे महिमामंडित करता है इससे टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलता है । कबीर मठ उन्ही मे से एक है यहां भोजन सेवा , वस्त्र दान सेवा जैसी सुव्यवस्था की नितांत आवश्यकता थी इससे टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा ।
▪कम्पनी नील , अगरबत्ती इत्यादि उत्पादन कार्य रही है फिर व्यवसायिक खेती का क्या मतलब ?
जनपद की मुख्य जीविका खेतीबाड़ी है जिसकी हालत ठीक नही है हम देखते है धान गेहूं की खेती मे किसानो के पास खाली समय ज्यादा होता है नतीजा बेमतलब इधर - उधर घूमना होता है ऊपर से चौराहो पर बैठने से आदत मे बेतरतीब बदलाव होता है व्यवसायिक खेती मे इतना समय खाली नही होता है ऊपर से आमदनी का प्रतिशत इतना होता है जितने से खुशहाल जिन्दगी जीया जा सकता है और फिर कम्पनी का उत्पाद के साथ व्यवसायिक खेती एक हिस्सा है । इससे जनपद भी समृद्धशाली होगा , कृषि के चलते पिछड़ेपन का मिथक क्रम भी टूट जायेगा ।
▪बताया जाता है कम्पनी गांव को आदर्श गांव बनाने पर विचार कर रही है जबकि इससे पहले ग्रीन गांव का पहल कम्पनी कर चुकी है ?
हमारा संविधान आदर्श संविधान है । समता , पंथ निरपेक्ष इत्यादि इसकी प्राथमिकता है । आज कटुता का बोलबाला है इसके चलते हम इंसानी भूल रहे है , हमसे एकता - भाईचारा , प्रेम बंधुत्व दूर होते जा रहा है । आधुनिक विकास की ललक हमसे हमारा हरा - भरा वातावरण , हमारा इंसानी गुण को छीन ले रहा है । जब हम एक छोटे से गांव मे हरे - भरे वातावरण और एकता भाईचारे मे जीवन यापन नही कर सकते तब हम पूरे देश की संवैधानिक परिकल्पना कैसे कर सकते है । हमारी सरकारे विकासशील कार्यो मे लगातार इजाफा कर रही है सड़क , बिजली , स्वच्छ पेयजल से लेकर आवास , शौचालय , डस्टबिन , नाली निर्माण , पौष्टिक आहार , पौधारोपण , टीकाकरण जैसी जीवनोपयोगी बहुत सी चीजे उपलब्ध करवा रही है लगभग हर ग्राम पंचायतो मे विद्यालय भी है और सफाईकर्मी भी है । फिर भी शिक्षा मे स्वच्छता मे बेतहाशा कमी नजर आती है सुचारू रूप से कुछ देखने मे नही आता है प्राथमिक विद्यालयो की गुणवत्ता परक शिक्षा स्तर सोचनीय विषय हो गया है । साफ - सफाई की स्थिति ठीक नही है स्वच्छता की व्यवस्था एकदम लचर है । ये सब ऐसा इसलिए है क्यो कि इसे व्यक्तिगत तौर पर देखा जा रहा है गांव के विकास के रूप मे नही देखा जा रहा है । अगर हम हमारे आपसी मतभेद , बढ़ती कटुता , पनपते द्वेष , अशोभनीय सोच को बढ़ावा देना बन्द करे , इसे रोके , तो हम सब का जीवन आदर्श जीवन हो जायेगा । हमे आदर्श संविधान मिला है फिर हम हमारा गांव आदर्श गांव बनने से कोसो दूर क्यो है गांव को आदर्श बनना ही चाहिए ।