विकास के मायने मे बदनसीब जिन्दगी !

विकास के मायने मे बदनसीब जिन्दगी ! 

जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - विकास के मायने मे पंच भौतिक शरीर वाला मानव एक इंसानी जिन्दगी से लेकर विकास के वो तमाम आयाम देखने लगा है़ जहां इंसानियत शर्मसार होती है़ फिर भी बेबसी खत्म होने का नाम नही ले रही है़ । लगता है़ विकास के मायने अभी समझ मे आये नही है़ जितना विकास के दिन देख रहे है़ उतना ही जिन्दगी कश्मकश होती जा रही है़ । 
उल्लेखनीय है़ कि अनेको उपलब्धियो के बीच सुखमय जीवन जीने वाला आधुनिक युग का मानव समाज दहशत की जिन्दगी जीने को इस कदर मजबूर हो गया है़ जैसे कोई मजबूरी धीरज की सारी सीमाये तोड़ देने को कह रही है़ एक तरफ जहां अपने मेकअप चेहरे की खूबसूरती को ढक कर जिन्दगी को सुरक्षित करने का काम करना पड़ रहा है़ वही दूसरी तरफ " घर मे रहो सुरक्षित रहो " की नीति को अपना कर जिन्दगी को जीवन दान देना पड़ रहा है़ । हालांकि इसके किये हुए इजाद काम तो कर रहे है़ पर उससे कही अधिक जागरूकता का अभिन्न अंग सतर्कता काम कर रहा है़ । इससे कही न कही ये लगता है़ कि विकास के प्राथमिकता मे विचारो का मूल्यांकन होना चाहिए । बतौर उदाहरण प्लास्टिक है़ जिससे बनी सुविधाजनक छोटी - छोटी थैलियो से दुष्परिणाम देखने पड़ रहे है़ । बताया जाता है़ कि इसके रोजमर्रा के प्रयोग से वातावरण प्रदूषित हो रहा है़ । वही दूरगामी इजाद वाहनो से हवाये विषाक्त हो रही है़ । कृषि उपज के क्रम मे सृजित तकनीकियो से जहां स्वस्थ लाभ से वंचित होना पड़ रहा है़ वही अधिक उपज देने वाली दवाइयां गुणो को प्रभावित कर जीवन को अनेको रोगो से ग्रसित कर रही है़ आज नब्बे प्रतिशत से अधिक लोग उस बदहजमी रोग के शिकार हो गये है़ जो अनेको बीमारियो का जन्मदाता है़ । रोजी - रोजगार के साथ खाद्य पदार्थो का उत्पादन करने वाली कंपनियो द्वारा तैयार हो रहे प्रोजेक्टो से स्वास्थ्य हानि और प्रदूषित होता वातावरण किसी से छुपा नही है़ । सृजित मानवी व्यवस्था अपराध भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर इंसानियत के गुण को खत्म कर दिया है़ । आरक्षण के ताबूत ने जहां योग्यताओ पर ताला जड़ दिया है़ वही जातीय सामुदायिक सोच ने नजरंदाज कर दिया है़ । धर्म - कर्म सिखाने वाले धार्मिक ग्रंथ खून के प्यासे , जिन्दगी का भूखा बना दिया है़ । ये सब उन विकास की प्राथमिकताओ मे देखना पड़ रहा है़ जो जिन्दगी के आयामो मे खुशनसीबी के दिन रैन देते है़ । दो देशो के बीच लड़ाई झगड़ो मे अहम साबित होने वाले विनाशकारी हथियार विकास के ही अंग है़ ।
विकास के मायने मे धर्म को विलग नही किया जा सकता , संस्कृति को अलग नही किया जा सकता जातीय , कुल खानदान के रीति रिवाज को , कुल देवताओ को अलग नही किया जा सकता , ये सब समाजिक विकास , परिवारिक विकास , जातीय विकास , भौतिक विकास , धार्मिक विकास के वे पहचान है़ जिसे सदियो से गुनगुनाया जाता रहा है़ , मनाया जाता रहा है़ , माना जाता रहा है़ , मगर अफसोस आज तक किसी के यहां किसी भी प्रकार का विकास स्थिर नही हो सका , बिखराव और विनाश का क्रम उसी प्रकार चल रहा है़ जैसे समय की नीयत मे बंधी घड़ी की सुई चलती है़ । अलबत्ता ये कहना कोई अतिशयोक्ति नही होना चाहिए की विकास के मायने मे मानव बदनसीबी की जिन्दगी जी रहा है़ ।

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