राजनीति की करवटो मे नफरत के शगुफे !

राजनीति की करवटो मे नफरत के शगुफे ! 

जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - मतो के बूते बनने वाले जनप्रतिनिधियो मे पनपती राजनीतिक प्रतिद्वंदिता अपना घिनौना चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है ब्लाक प्रमुखी तक के चुनाव अब नफरत की प्रतिद्वंदिता मे तब्दील हो गये है । नौबत हिंसात्मक कदम उठने लगे है इसके पूर्व मामला खरीदफरोख्त तक था । अब तो नामांकन करना भी मुश्किल हो गया है कमजोर व्यक्ति जहां अपने मौलिक अधिकार से वंचित हो रहा है वही कमजोर पड़ी राजनीतिक पार्टियो के उम्मीदवार दूर हो रहे है । कुर्सी की ललक इतनी प्रबल हो गयी है कि जनप्रतिनिधित्व बतौर बिजनेस स्वरूप धारण कर लिया है एक ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष तक की कुर्सी महत्वाकांक्षी लोगो की धरोहर हो गयी है आरक्षण के बूते मिली जनप्रतिनिधित्व का अवसर हो या फिर ब्लाक प्रमुख पद से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी का मामला हो अब ये जनप्रतिनिधि कुर्सिया सत्ता पक्ष व राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की कठपुतली हो गयी है । 
उल्लेखनीय है कि मुश्किल से छूटी गुलामी की जंजीर से देश की स्वतंत्रता को अक्षुण बनाने की पूर्वजो की परिकल्पना मानव की अल्पकालीय जीवन सफर की तरह सत्तर साल के दरम्यान ही धूल - धूसरित पायदान पर आ गया है आदर्श संविधान के रहते मिले अधिकार को राजनीतिक प्रतिद्वंदिता दीमक की तरह खोखला कर रहा है । आपसी भाईचारे से लेकर वह सबकुछ प्रभावित किया जा रहा है जो एक लोकतांत्रिक संविधान मे नही है । जातिवादी विभेदकारी नीति से शुरू हुआ राजनीतिक दौर धार्मिक उन्माद का सफर तय करते हुए अब उम्मीदवारी तक आ गया है ब्लाक प्रमुख पद की उम्मीदवारी से लेकर जिला पंचायत अध्यक्ष तक की उम्मीदवारी अब शासन सत्ता के बूते तय होने लगा है । लोकतंत्र के आदर्श के तौर पर रजिस्टर होने वाली राजनीतिक पार्टियो की पहचान विभेदकारी नीतियो पर होने लगी है ।

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