सभी पार्टियो के नीति बेहतर तो दल बदल का खेल क्यो ?

सभी पार्टियो के नीति बेहतर तो दल बदल का खेल क्यो ? 

कोई ऐसी राजनीतिक पार्टी नही है जिसके नेता दल बदल क्रिया अपनाते न हो । जब तक ये दल के दामन मे होते है तब तक पार्टी की हर नीतियां बेहतर होती है और खूब रास आती है कभी - कभी ऐसा भी दौर आता है जब इसकी पारदर्शिता के सामने आईने की पारदर्शिता धूमिल नजर आती है । मगर अफसोस ! जैसे ही दल बदलते है तैसे ही खूबियो की बनी लरिया टूट कर बिखरने लग जाती है जनहित की सारी नीतियां कांटे की तरह चुभन पैदा करने लगती है । इस दरम्यान जो विचार व्यक्त किये जाते है वह सत्य की कसौटी के होते है । उसकी अपनी एक व्यथित दुनिया होती है जो विश्वास को तोड़ - मरोड़ कर रख देता है । सबसे खास बात तब होती है जब इनके आने से ज्वाइनिंग पार्टी मजबूत होने लगती है और जनता की हमदर्दी आसमान छूने लगती है । इनकी दल बदल क्रिया जीत के मायने तय करने लगते है । हालांकि चुनाव बरसात के मौसम की तरह होता है कोई नाली गड़ही तो बचता नही है सबसे के सब पानी बहाने लगते है । इस दरम्यान अगर कुछ करने की जरूरत होती है तो बस बहते हुए पानी को ठहराव देने की जो ग्रीष्म ऋतु मे काम आता है । लेकिन इसकी पड़ी किसको है वक्त की कीमत से बड़ी चीज तो ये हो नही सकता है । अलबत्ता कुल मिलाकर दल बदल की क्रिया एक पहलू से उम्दा नजर आती है जिसे बुद्धिमानी कहा जाता है जिसकी महत्ता अवसर का लाभ उठाने के लिए होता है ।

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