जीवन की सदुपयोगिता
जीवन की सदुपयोगिता
पं रविन्द्र द्विवेदी
सन्त कबीर नगर = जीवन की सदुपयोगिता आध्यात्मिक चिन्तन से उस ईश्वर की उपासना मे है जिसने हमे मानव जीवन देकर अहैतुकी कृपा की है ।
हालांकि आध्यात्म को कई रूपो मे देखा जा रहा है । जो किसी भी दशा मे ठीक नही हो सकता है । आध्यात्म का स्वरूप ईश्वर भक्ति से है । अगर हम अपनी क्षणिक मंशा की पूर्ति मे आध्यात्म का अर्थ लगा रहे है तो यह हमारी समझ की ही नही अपितु मानव जीवन की भी निरर्थकता होगी । यह एक सूक्ष्मतम विषय है जब हम आध्यात्म का चिन्तन तात्विक रूप से करते है तब इसकी सिद्धि ईश्वर के स्वरूप मे होती है जिससे कल्याण सुनिश्चित है । हालांकि वक्त की नजाकत कहे या मानव जीवन की सार्थकता का हास कहे आध्यात्म को हम भौतिक जीवन के रास्ते इसके असली स्वरूप को बदल दे रहे है । जिसका उदाहरण बहुतायत रूपो मे देखा जा सकता है । श्री मद्भागवत गीता के " आध्यात्म ज्ञान नित्यत्वं तत्वज्ञानार्थ दर्शनम
। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम ज्ञानं यदतोSन्यथा " आध्यात्म ज्ञान मे नित्य स्थिति और तत्व ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को ही देखना यह सब ज्ञान है और जो इससे विपरीत है वह अज्ञान है ऐसा कहा है " श्लोक को आत्मसात करना चाहिए । इसके पूर्व हमे " अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्त निधनान्येव तत्र का परिवेदना ।। हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले है । केवल बीच मे ही प्रकट है फिर ऐसी स्थिति मे क्या शोक करना है " पर परिपक्व हो जाना चाहिए । इसके लिए हमारा एक और सार्थक चिन्तन होना चाहिए । जैसा कि अष्टावक्र गीता मे कहा गया है " कृतम न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा ।
दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्यु परम्यताम ।। शरीर मन वाणी से कठोर परिश्रम द्वारा किये जाने वाला , थकाने वाला , दुःख देने वाला कर्म क्या कितने ही जन्मो से तुम करते हुए नही आ रहे ? तो फिर अब उससे उपराम क्यो नही होते ? उससे मुंह क्यो नही मोड़ते ? " तभी आध्यात्म ज्ञान की सार्थकता मे भक्ति के स्वरूप " सापरानुरक्तिरिश्वर: " को सार्थक कर सकेंगे ।