थोड़ा ठहर जाया कर
थोड़ा ठहर जाया कर ऐ वक्त ! कभी तो , थोड़ा ठहर जाया कर । इतनी भी क्या बेरुखी , यकीन का उम्मीद तोड़ दिया । मुसाफिर था एक दिन थक जाता वो । देख तेरी उंगली किसी नन्ही ने , पकड़ रखा था । बेपरवाह होकर गोद से । मां भी असहज हो गई होगी उसकी , भय के साये मे बांह की होगी , कसके मजबूत । खुशियो का वह दौर , जिसे तूने ही दिया था । मां की गोद से नन्हे की , उंगली पकड़ा कर भविष्य का आसरा किया था । फिर ऐसी क्या खता हुई ? जिम्मा तो निभा रहा था वो बनकर आसरा , तमाम आशियां संवार रहा था वो । सुहैल अहमद जिला संवाददाता डी डी न्यूज सन्त कबीर नगर इन्तकाल = 24-2 -2024 जी एल वेदांती " कवि "