मादकता की दुनिया मे भक्ति स्वरूपा होली !

 मादकता की दुनिया मे भक्ति स्वरूपा होली ! 


▪बुद्धि लुम्पती यद् द्रव्यं मदकारी तदुच्यते▪


जी एल वेदांती

सन्त कबीर नगर - कितने आश्चर्य की बात है कि भक्ति की पराकाष्ठा पवित्रतम पर्व होली को रंगोत्सव के बीच तामसी मादक पेय के साथ मनाया जाने लगा है । यकीनन ये बड़े खेद की बात है आज इस पवित्रतम पर्व को मांस मदिरा के पटल पर मनाया जा रहा है । 

विदित हो कि होली का पर्व भगवान विष्णु भक्त प्रहलाद की उस भक्ति की कठिन परीक्षा का परिणाम है जो हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने अपनी वरदानी शक्ति को प्रहलाद के ऊपर प्रयोग कर भक्ति को जलाने की कोशिश की थी । शास्त्रो के मुताबिक यह ऐसी शक्ति थी जिससे होलिका जलती नही थी । यह प्रयोग होलिका को तब करना पड़ा जब हर तरफ से हिरण्यकश्यप नाकामी का स्वाद चख चुका था । अपने ही पुत्र प्रहलाद से उसकी भक्ति से पीड़ा थी उसका मानना था जो कुछ हूं मै ही हूं लोग हमारी पूजा करे । इसी मानसिक पीड़ा के चलते प्रहलाद को धधकती आग पर रखी कड़ाही के खौलते तेल मे डाल दिया था पर जैसा कि " समोSहम सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योSस्ति न प्रिय :। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥ यह देख हिरण्यकश्यप बहुत ही आहत हुआ था और फिर अंतिम भरोसा को साकार रुप की नीयत से आग से न जलने वाली होलिका का आजमाइश किया जो परिणाम स्वरूप विफलता के साथ - साथ अंतिम वक्त बनते हुए विनाश का कारण बन गया । हालांकि इस तरह के प्रयोग के पीछे कण - कण मे भगवान विष्णु को मानने वाले प्रहलाद की भक्ति " सापरानुरक्तीरीश्वर: " को गलत साबित करना था । यानी कि पिता - पुत्र के बीच भक्तिमय उस प्रेम का परख युद्ध था जो ईश्वर को कण - कण मे दर्शन करा रहा था ।

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