मतदाता कब समझेंगे अपने वोट की कीमत ?
मतदाता कब समझेंगे अपने वोट की कीमत ?
जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - " देर आये दुरूस्त आये " लोक प्रसिद्ध इस कहावत को लोग समझे या न समझे पर चुनाव लड़ने वाला हर प्रत्याशी समझता भी है और फायदा भी उठाता है । लेकिन जख्मो पर छिड़के नमक की तरह पांच साल तक दर्द सहने वाला मतदाता नही समझ पाता है मजे की बात तो ये है कि इन्हे प्रत्याशी के हर दिखावे संस्कृति और संस्कार लगते है । ये स्थिति तब है जब ये अधिकारो के शीर्ष पर बैठे है ।
उल्लेखनीय है कि दिवा स्वप्न की तरह चुनाव का आसार होते ही मतदाताओ को रिझाने का सिलसिला शुरू हो जाता है जूं पड़े कानो को घर भीतर की आवाज सुनाई देने लगती है वाहनो मे इंधन की मात्रा बढ़ जाती है ढीली जेबे वजन होने लगती है टेढ़े तीखे मुंह मे मीठे शहद घुल जाते है वाणी और हाथो मे संस्कारो के पुल बंध जाते है कदमो की आहट हमदर्दी के राग अलापने लगते है गली - मुहल्ला , चौराहे बाजार अभिवादन के पांव फैलाने लगते है नीद की तो हाल न पूछो पलक झपकने की आहट भी सुनाई दे जाती है । लेकिन पछतावा सीख सबक के साथ मतदाता चुनावी अवसर को ऐसे भूनाते है जैसे " मै नर राची न लखी , तुम कस लख्यो सुजान " की कहावत चरितार्थ करने वाली अपने प्रेमी के प्रेम दीवानी हुई एक प्रेयसी ने किया था । हालांकि इस सम्बन्ध मे बुद्धिजीवी वर्गो की माने तो इसकी वजह तात्कालिक मिलने वाला वह बेशकीमती नजराना है जिसे शब्दो की दुनिया मे मांस , मदिरा , रुपया इत्यादि कहते है । बहरहाल अपनी वोट की कीमत को समझ कर मतदाता कब वोट करेगे इसका उत्तर एक यक्ष प्रश्न की तरह हो गया है । अलबत्ता हर पांच साल पर सीख पछतावे सबक के साथ वोट की कीमत समझने की बात तो की जाती है पर उसको अमल मे लाया नही जाता है । ऐसे मे यह सवाल उठना लाजिमी है कि मतदाता कब समझेंगे अपने वोट की कीमत ?