बादल की गरज से रो पड़ी गेहूं की बालियां
बादल की गरज से रो पड़ी गेहूं की बालियां
जी एल वेदांती
संत कबीर नगर - यह और बात है कि ज्ञान के बूते कायनात मे मानव जीवन की श्रेष्ठता है पर ब्रहांड की और सृष्टिया किसी मामले मे कम नही है भले ही वो खुले शब्दो मे कुछ प्रकट न कर सके पर उनके भीतर भी ज्ञान का वह अंग है जिसे हम सहानुभूति मे दया , करुणा का भाव कहते है उन्हे भी सुख - दुःख का आभास होता है जिसका बहुत सा उदाहरण देखा जा सकता है । बहरहाल आज जब भोर मे बादल गरज रहे थे और किसानो के चेहरे पर चिंता की लकीरे गहरी होती जा रही थी तब खेतो मे खड़ी गेहूं की बालियां रो रही थी । उनके अंगो का बिखरना यह बताने की कोशिश कर रहा था । रे किसान ! तू ये मत समझ कि बादल की गरज से सिर्फ तुम्ही आहत हुए हो । जरा गौर से मुझे भी देख ! हम भी आहत हुए है़ हो सकता है़ तेरी चिंता मे अपने लोगो की ही फिकर रही हो पर मुझे देख मै तेरे लिए भी चिंतित हूं और उन पशु पक्षियो के लिए भी चिंतित हूं जो हमे अपना जीवन समझते है़ । लेकिन ये चिंता तुझे क्यू ? तू तो अपने भाग्य का निर्माता है जैसा चाहे वैसा कर्म कर तू तो बन सकता है अभागे तो हम लोग है जो जीवन तो पाते है पर उसे संवार नही सकते । वर्ना तेरे विकारो का हमे जो कारण बताया जाता है वह होने नही पाता । ये तू ही है जो अपने ज्ञान का प्रयोग कर खुद को रोगी बनाकर हमे भी हिस्सेदार बना दिया ।