महिला सशक्तिकरण की राह कितनी होगी आसान घर की ड्योढ़ी होती है़ महिला ग्राम प्रधान की सीमा

सशक्तिकरण की राह कितनी होगी आसान घर की ड्योढ़ी होती है महिला ग्राम प्रधान की सीमा

चुनाव काल से लेकर बधाई तक ओझल रही महिलाये

जी एल वेदांती
सन्त कबीर नगर - महिला सशक्तिकरण के दृष्टिगत होने वाले ग्राम पंचायत चुनाव मे जनपद मे कुल 254 महिला ग्राम प्रधान चुनी गयी है़ । जो अब तक के दौर का सर्वाधिक महिला ग्राम प्रधान का पद है़ । इससे पहले जाति विशेष के अन्तर्गत बतौर आरक्षण महिला ग्राम प्रधान चुनी जाती रही है लेकिन महिला सशक्तिकरण को देखते हुए पूरे प्रदेश मे जहां बतौर महिला सीट 19659 महिला ग्राम प्रधान बनेगी वही जनपद मे महिला सीट 126 , अन्य पिछड़ा वर्ग 71 व अनुसूचित जाति 57 के साथ कुल 254 महिला ग्राम प्रधान चुनी गयी है़ । अलबत्ता अब तक महिला ग्राम प्रधान का कार्यकाल किसी और के अगुआई मे बीतते आया है महिला ग्राम प्रधान कभी प्रतिनिधित्व नही कर पायी है । हद तो तब और होता गया जब अधिकारियो के बीच कथित लोगो को प्रधान जी के रूप मे जाना जाता रहा । 
लिहाजा आज जब महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार पुरजोर कोशिश करती हुई बतौर प्रतिनिधित्व बड़े पैमाने पर ग्राम पंचायतो की जिम्मेदारी महिला वर्ग को देती नजर आ रही है तब जिला प्रशासन की कितनी भूमिका होगी यह एक सवाल उस उदासीनता से है जिसके अस्तित्व को अब तक प्रशासन ने कायम रखे रहा । 
बहरहाल जो पुरुष प्रधान समाज कुल खानदान की इज्जत मानकर सशक्तिकरण की राह पर खड़ी महिला ग्राम प्रधान की सीमा घर की ड्योंढ़ी कर रखी है उस पुरुष प्रधान समाज को वक्त के इस दौर मे आशा , आंगनबाड़ी कार्यकत्री आदि की नौकरी कर रही उन महिलाओ को देखना चाहिए जो दौरान ड्यूटी देर सबेर अपने फील्ड वर्क के दायित्व को बखूबी निभा रही है । यही नही वैश्विक महामारी कोविड 19 जैसी संक्रामक बीमारी से बचाव कार्य की लड़ी गयी इनकी लड़ाई को नही भूलना चाहिए , जिसके सामने पूरी दुनिया नतमस्तक हो गयी थी लेकिन नाम मात्र की तनख्वाह पाने वाली आशा , आगनबाड़ी कार्यकत्री की मामूली नौकरी करने वाली महिलाये बचाव कार्य मे लगी रही । लेकिन वही मोटी तनख्वाह के कुछ विभाग के लोग घर बैठे अपनी जान की हिफाजत कर रहे थे । वे इतना भी किरदार निभा नही सके जिसको शब्दो की दुनिया मे जागरूकता और जीवन की दुनिया मे सतर्कता कहते है । बशर्ते ग्राम प्रधान महिला का इतना भी अधिकार नही रह गया है कि वो अपने ग्राम पंचायत की कोई समस्या कोई छोटा - मोटा विकास देख सके , प्रखंड , विकास भवन देखना तो बड़े दूर की बात है । सारे निर्णय कथित अगुआई कर रहे लोगो की होती है । विकास कार्यो की बनती फाइलो पर हस्ताक्षर हो पाता है की नही कुछ कहा नही जा सकता । ऐसे मे जब सरकार की नीति महिला सशक्तिकरण को लेकर और प्रबल हो गयी है तो अब ग्राम प्रधान महिलाओ को सशक्तिकरण का प्रतिफल और आत्मनिर्भर बनने के सुनहरे मौके कितने बेहतर साबित होगे । यह अभी वक्त के गर्भ मे है बहरहाल प्रशासन की उदासीनता अभी कायम के दहलीज पर ही देखा जा रहा है ।

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