सामाजिक दर्पण संगोष्ठी " मां के गर्भ मे दम तोड़ती बेबस बेटिया " का आयोजन

सामाजिक दर्पण संगोष्ठी " माँ के गर्भ मे दम तोड़ती बेबस बेटियां " का आयोजन

भ्रूण हत्या जैसेजघन्य अपराध से अब समाज को निजात मिल ही जानी चाहिए - रीना त्रिपाठी

लखनऊ - वीरांगना महारानी लक्ष्मी बाई जयंती की पूर्व संध्या पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया । विषय " मां की कोख मे दम तोड़ती बेबस बेटियां " संगोष्ठी मे पेज के संस्थापक और शकुंतला तोमर , वरिष्ठ समाजसेवी , मार्गदर्शक व समाज की रूढ़ियो के विरुद्ध लड़ने वाली श्रीमती शाइस्ता अंबर , मिशन पिंक इंडिया की कोऑर्डिनेटर और गाइनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर मिथिलेश सिंह , द टेंथ रिडील नामक पुस्तक जो कि कन्या भ्रूण हत्या की थीम पर आधारित है लिखने वाले इंजीनियर सपन सक्सेना , समाज मे बच्चो की शिक्षा के लिए कार्य करने वाली रेखा शुक्ला , तथा भारतीय नागरिक परिषद की महामंत्री रीना त्रिपाठी ने हिस्सा लिया ।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए रीना त्रिपाठी ने कहा कि भ्रूण हत्या जैसे जघन्य अपराध से अब समाज को निजात मिल ही जानी चाहिए क्यो कि हम 21वी शताब्दी के उन्नत मानसिकता वाले समाज मे रह रहे है जहां लड़के लड़की का भेद अब खत्म होना चाहिए । लड़कियो को निम्न दर्जे मे रखने की प्रक्रिया यदि समाप्त न की गयी तो यूं ही मां की कोख मे बेटियां दम तोड़ती रहेंगी । शकुंतला तोमर ने कहा कि कन्या भ्रूण हत्या , लड़को को प्राथमिकता देने तथा कन्या जन्म से जुड़े निम्न मूल्य के कारण जान बूझकर की जा रही है कन्या शिशु की हत्या । ये प्रथाएं उन क्षेत्रो मे होती है जहां सांस्कृतिक मूल्य लड़के को कन्या की तुलना मे अधिक महत्व देते है । इसी क्रम मे डां मिथिलेश सिंह ने कहा कि भारत मे जन्म के समय लिंगानुपात मे गिरावट आई है , जबकि पिछले 65 वर्षों मे प्रति व्यक्ति आय लगभग 10 गुना बढ़ गई है । 
इसका कारण लोगो की बढ़ती आय हो सकती है , जिसके परिणाम स्वरूप साक्षरता बढ़ रही है और इससे परिवारो की सेक्स - सेलेक्टिव प्रक्रियाओ तक पहुँच आसान हो जाती है ।खुद एक स्त्री रोग विशेषज्ञ होने के कारण उन्हे आए दिन ऐसे मामलो का सामना करना पड़ता है जो लड़की होने पर सफाई करवाना चाहते हैं जबकि उनके अस्पताल के बाहर साफ - साफ बोर्ड लगा है कन्या भ्रूण हत्या पाप है और भ्रूण का परीक्षण यहां नहीं किया जाता यह एक निंदनीय अपराध है
। प्रख्यात समाजसेवी शाइस्ता अंबर जी ने सभी लोगो को बताया कि किस प्रकार उन्होंने तीन तलाक जैसी कुप्रथा से समाज को निजात दिलाया । अब इस तरह का खिलवाड़ करने वाले लोगो को कड़ी सजा का प्रावधान है यह सब समाज को बताने के लिए काफी है कि बेटे और बेटी समान होते है । हक और अधिकारो की बात सभी को पता होनी चाहिए गलत को गलत कहने की ताकत यह दिमाग के अंदर आ गई तो वह अपने बच्चे की रक्षा के लिए समाज से जरूर लड़ेगी और कोख मे पल रही बेटी को बचाने का पूरा प्रयास करेगी । आज समाज मे हम नवरात्रि मे नव दुर्गा की पूजा करते हैं क्यो कि हमारा धार्मिक आधार बेटियां है । कल हम महान क्रांतिकारी रानी लक्ष्मीबाई का जन्मदिन मनाएंगे और 1857 की क्रांति की महान वीरांगना जो कि एक हाथ मे अपने बेटे को और एक हाथ से तलवार चला कर अंग्रेजो को लोहे के चने चबवा रही थी फिर भी अंग्रेज उच्च अधिकारी उसकी तारीफ आजादी के मर्द के रूप मे करते है । शाइस्ता अंबर ने कहा कि वाकई मुझे दुख होता है यदि कोख मे बेटियो को खत्म किया जाता रहेगा तो लोग अपने बेटे के लिए बहू और अपना परिवार चलाने के लिए संतति देने वाली मां कहां से लाएंगे । नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो अमर्त्य कुमार सेन ने अपने विश्व प्रसिद्ध लेख " मिसिंग वूमेन " मे सांख्यिकीय रूप से यह साबित किया है कि पिछली शताब्दी के दौरान दक्षिण एशिया मे 100 मिलियन महिलाएँ गायब हुई है । इस प्रकार के आंकड़े वाकई समाज के विद्वानो को सोचने के लिए विवश करते है ।
शिक्षिका रेखा शुक्ला ने बताया कि आज गांव और शहर के स्तर पर गांव मे फिर भी चार से पांच लड़कियां एक परिवार मे मिल जाती है पर शहरो मे आर्थिक दबाव के कारण सभी को दो बच्चे मे एक बेटा और बेटी चाहिए । क्या यह 100% संभव हो सकता है निश्चित रूप से नही , आज पढ़ा - लिखा समाज बेटे और बेटी मे भेद नही करता , पर क्या समाज जिस प्रकार बेटा होने पर खुश होता है उसी प्रकार बेटी होने पर भी और एक से अधिक बेटी होने पर खुश हो सकता है निश्चित रूप से अब समाज की दशा और दिशा बदलनी चाहिए ।
इंजीनियर सपन सक्सेना जिन्होंने कन्या भ्रूण हत्या जैसी जघन्य समस्या जो कि राजस्थान मे आमतौर पर व्याप्त है पर एक पुस्तक लिखी है जिसमे उन्होंने एक रानी की कहानी बताई है जो सिर्फ एक वंश की पहली संतान होने के कारण संपत्ति न ले ले इसलिए उसकी हत्या कर दी जाती है । यह बात तो राजघराने की है आज भी राजस्थान के गांव मेंलड़कियो को जन्म लेते ही मार देना ज्यादा अच्छा समझा जाता है । यदि कन्या भ्रूण हत्या का आधार समझा जाए तो कही न कही आज भी हम समाज की मानसिकता को नही बदल सकते है । आज भी समाज मे समस्त क्रिया कर्म और संस्कारो का मालिक बेटे को भी समझा जाता है । आज भी समाज मे यह व्याप्त है कि आने वाली पीढ़ियो का पोषक उनका पुत्र होना है । दहेज जैसे सुरसा का मुंह खोले खड़े राक्षस बेटियो के साथ अक्सर खड़े पाए जाते है ।अक्सर माता - पिता को अच्छी शिक्षा बच्चियो को दिलाने के बावजूद दहेज रूपी राक्षस का मुंह भरना पड़ता है और इन सब से बचने के लिए उन्हे लगता है कि बेटी का जन्म हो ही ना । आज सरकार ने विभिन्न कानून बना रखे है जो कि कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए काफी है । डॉक्टरो के ऊपर कठोर दंड निर्धारित है यदि वह भ्रूण की जांच करते है । पर क्या इतना कहने और करने से इतिश्री हो गई । निश्चित रूप से नही । समाज मे व्याप्त सभी लोगो को सभी परिवारो को यह सोचना होगा कि अहिल्याबाई , चांद बीबी , लक्ष्मीबाई , बेगम हजरत महल जैसी क्रांतिकारी महिलाएं यदि हमे आजादी की लड़ाई मे रास्ता दिखा सकती है तो वही देश की सत्ता मे काबिज सरोजनी नायडू इंदिरा गांधी , कल्पना चावला , जयललिता , मेरी काम सहित स्वर्णिम युग रखने वाली महिलाएं है जिन्होंने न केवल अपनी योग्यता से समाज को राह दिखाई बल्कि बड़े - बड़े दुश्मनो को भी धूल चटा दी । आज समाज को सोच बदलनी होगी । बेटिया बेटो से कम नही होती और इस गर्व के साथ हमे नमन करना होगा । ब्रिटिश जनरल ह्यू रोज के अनुसार क्रांतिकारियो मे एक अकेला मर्द महारानी लक्ष्मी बाई थी । इसी संदेश के साथ संगोष्ठी का समापन किया गया ।

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