आम जनता से रुझानो को जानने का मीडिया द्वारा क्यो किया जाता है प्रयास ?

आम जनता से रुझानो को जानने का मीडिया द्वारा क्यो किया जाता है प्रयास ?


सन्त कबीर नगर = लोकतंत्र के महापर्व मे होने वाले चुनाव मे मीडिया द्वारा ग्राउंड स्तर पर मतो एवं मताधिकारियो से रुझान स्थिति जानने का अथक प्रयास खूब चल रहा है । कही भीड़ मे खुद चला जा रहा है तो कही खुद भीड़ इकट्ठा कर लिया जा रहा है जहां दस बीस लोग दिख गये वहां भी फौरन पहुंचा जा रहा है और लोगो से उनके राय सहित वोट किसको किया जा रहा है जैसे सवालो का उत्तर लिया जा रहा है जनता भी इनकी हां मे हां मिलाते हुए बड़ी बेबाकी से अपनी राय दे रही है । ऐसे मे यह सवाल उठता है कि क्या इसे आम जनमानस से जानना चाहिए ? क्या रुझानो को जनता से जानना उचित है ? अगर उचित है तो किस लिहाज से उचित है ? ऐसे तमाम सवाल खड़े होते है जिसका उत्तर जानना अति आवश्यक है क्यो कि अगर मतो को जानना या मताधिकारियो से किसकी सरकार बननी चाहिए वगैरह को खुले तौर पर जानना जायज है तो मतदान की गोपनीयता क्यो रखी जाती है ? वही अगर इसे लोकतान्त्रिक दृष्टि से देखा जाय तो इससे बड़ी हानि होने की सम्भावना होती है क्यो कि आम जनता से जब राजनितिक दलो को उनके प्रत्याशियो को यह मालूम हो जाता है कि जनता का रुझान किस तरफ है तो उन्हे अपनी ओर आकर्षित करने के लिए बहुत कुछ रास्ते अख्तियार किये जा सकते है अब तो देखने मे भी आ रहा है कैसे कैसे हथकंडे प्रत्याशियो द्वारा राजनितिक दलो द्वारा अपनाया जा रहा है अगर इस प्रकार की गतिविधि के मूल पर विचार किया जाय तो कही न कही रुझानो की पहले से जानकारी होना भी इसकी एक वजह होती है । 
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 128 के तहत मतदान की गोपनीयता का भंग होना अपराध है । खबरो के मुताबिक पूर्व के केंद्रीय मंत्री डां सी पी ठाकुर अपनी पत्नी के साथ मतदान किये थे जो गोपनीयता भंग के आधार पर रद्द कर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था ऐसे कई उदाहरण देखने मे आये है । यानी की गोपनीयता इतनी की अभिन्न अंग कहलाने वाली पत्नी के साथ भी मतदान करना अपराध की श्रेणी मे आता है तो मीडिया जो आम चौराहो आदि स्थलो जाकर जनता से रूबरू हो रही है उनसे उनकी राय जान रही है क्या ऐसा होना चाहिए ? चर्चाओ की माने तो ग्राम पंचायती चुनाव मे मतगणना के दौरान वोटो की स्थिति से रूबरू होने वाला ग्राम प्रधान चुनावी कसक निकालने मे कोई कोर कसर नही छोड़ता है जिन लोगो का जिस मुहल्ले का वोट उसके पक्ष मे नही पड़े होते है वे लोग विकास की योजना लाभ से महरूम पाये जाते है यही हाल हर चुनाव मे होने लगा है यानी तुष्टिकरण आदि मे मतदान की गोपनीयता भंग एक अहम कड़ी बनकर उभरा है । चुनाव आयोग मतदान जागरूकता का अभियान चलाने पर जोर तो जरूर देता है पर मतदान की गोपनीयता बतौर मामले मे कमजोर सा दिखाई दे रहा है जिसका उदाहरण बतौर मीडिया द्वारा आम जनता से सरकार बनने बनाने जैसे मुद्दो के माध्यम से गोपनीयता भंग के क्रम मे देखा जा रहा है ।

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