बेसिक शिक्षा परिषद व माध्यमिक के विद्यालयो मे पढ़ाई सुचारू से की जा सके इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे = रीना त्रिपाठी
बेसिक शिक्षा परिषद व माध्यमिक के विद्यालयो मे पढ़ाई सुचारू रूप से की जा सके इसके लिए कठोर कदम उठाने होंगे
रीना त्रिपाठी
लखनऊ = जैसा की विदित है उत्तर प्रदेश स्तर पर बेसिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा मे सैकड़ो शिक्षक संगठन बन गए है । निश्चित रूप से विभिन्न विभागो मे बने हुए कर्मचारी संगठनो की मंशा कर्मचारियो के हित मे काम करने की रही होगी परंतु आज के समय मे ज्यादातर शिक्षक संगठन एक संगठन से असंतुष्ट होने के बाद बनाए गए संगठन होते है ।
शिक्षक संगठन से जुड़े हुए पदाधिकारी अधिकतर विद्यालय नही जाते प्रांत के पदाधिकारी तो बिल्कुल भी नही , शिक्षको के हित के मुद्दे लेटर पैड मे दिए तो जाते है पर उनकी कोई खास पैरवी नही की जाती ताकि वोट और चंदे की राजनीति चलती रहे । शिक्षको के मत से चुनाव प्रक्रिया अब लगभग सभी संगठनो मे खत्म हो चुकी है स्वयं का मनोनयन शेष बचा है और जहां है अभी वह सिर्फ पहले से फिक्स दिखावा प्रक्रिया । लगभग लाख शिक्षको से उगाए गए चंदे की लड़ाई ।
ऐसा लगता है विभिन्न संगठनो के बड़े पदाधिकारी तनख्वाह बेसिक या माध्यमिक शिक्षक के रूप मे ना लेकर नेता के रूप मे पा रहे है जिसे देखकर आम शिक्षक भी हतोत्साहित होता है । उसका भी मन दुखी होता है कि यदि वह भी किसी शिक्षक संगठन मे जुड़ जाता है तो शायद दूरदराज के विद्यालय मे जाने से कुछ राहत मिल जाए । पर इन सभी गतिविधियो मे प्रभावित होती है उन हजारो पदाधिकारियो के विद्यालय ना जाने से बच्चो की पढ़ाई व्यवस्था...... कुंठित होता है वह बालमन जो कभी - कभी विशेष पदाधिकारियो के रूप मे नियुक्त अपने शिक्षक को देखने से भी वंचित रह जाता है ।
अतः सरकार को चाहिए कि वह शिक्षकों के बीच से बनाए गए एकेडमिक रिसोर्स पर्सन जैसे पदो मे नियुक्त शिक्षको को विभिन्न संघो के पदाधिकारियो की ध्यान से यदि जांच करे तो पाएंगे यह सब विशेष संगठन से जुड़े हुए रहते है और बार - बार यह कहिए जीवन भर उन पदो पर काबिज रहते है ।
काम भले कुछ भी ना करे यदि इनके स्कूलो की स्थिति देखी जाए तो बद से बदतर क्यो कि महानुभाव लोग अपने स्कूल कभी जाते ही नही ।
शिक्षको के बीच से चुनकर जिन मुट्ठी भर शिक्षको को ब्लॉक स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का ठेका दिया जाता है उनके खुद के स्कूल या तो विवादित होते है या आपसी विवाद के कारण वह सब किसी संगठन यह रिसोर्स पर्सन का पद ज्वाइन करके अपने स्कूलो से मुक्ति पाते है । जिन शिक्षको की स्कूल की स्थिति बहुत ही बेहतरीन हो उन्हे ही अन्य स्कूलो मे मॉडल शिक्षक व शिक्षा मे सुधार के हेतु भेजा जाए ।
पर बता दे इन सभी को तनख्वाह बच्चो के पढ़ाने के नाम पर शिक्षको की ही मिलती है ।
अतः सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अब इन पदो को खत्म करके वापस हजारो शिक्षको को मुक्त करे ताकि वह विद्यालय जाकर अपने बच्चो को पढ़ाएं ।
कम से कम एक क्लास मे एक शिक्षक तो उपलब्ध हो सके ताकि हम भी दिल्ली और अन्य राज्यो के मॉडल स्कूल के संकल्पना मे पूर्णत: खरे उतर सके ।
अब देखते है आने वाले समय मे हरी घास की तरह उगे हुए सैकड़ो शिक्षक संगठनो मे योगी सरकार कैसे लगाम लगाती है ?
बता दे कि कई वर्षो से बेसिक शिक्षा विभाग ने मान्यता किसी भी संगठन को नही दी है फिर भी आप गाहे - बगाहे रंग - बिरंगे पैड अक्सर देखते ही होंगे , जो पुराने संगठन बने है उनमे भी आम शिक्षको के मत का कोई महत्व नही वहां जो प्रांतीय पदाधिकारी हैं वह मठाधीश हो गए है स्कूल जाना ना पड़े इसके लिए प्रांत के पदो पर जबरदस्ती काबिज है चुनाव प्रक्रिया शून्य हो चुकी है । ऐसे मे इन सभी को वापस स्कूल भेजकर कम से कम विद्यालयो की प्रक्रिया को सुचारू की जा सकती है ।
प्राथमिक शिक्षक संघ के पांच भाग , राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के दो भाग , विशिष्ट बीटीसी एसोसिएशन के दो भाग तथा अंतर्जनपदीय विशिष्ट बीटीसी एसोसिएशन , यूटा , अटेवा , उटेक और इसी तरह जूनियर शिक्षक संघ के कई टुकड़े , पुरुषो के साम्राज्य मे असंतुष्ट महिलाओ का महिला संघ इत्यादि इत्यादि यह नाम तो बानगी मात्र है ।