।। भक्ति की पराकाष्ठा !।। भाव तो बहुत है पर कैसे करूं बखान = रीना त्रिपाठी

भाव तो बहुत है पर कैसे करूं बखान = रीना त्रिपाठी

मां पीतम्बरा की असीम कृपा 


लखनऊ ( सरोजनी नगर) श्री पीताम्बरा पीठ , बगलामुखी के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों मे से एक है इस बीच मे स्थापित धूमावती और बगलामुखी दस महाविद्याओ मे से दो है । माँ पीताम्बरा , बगलामुखी का स्वरूप रक्षात्मक है सब की रक्षा हेतु सदैव तत्पर शत्रुहनता के रूप मे मां अपने भक्तो की सदैव रक्षा करती है और उसके शत्रुओ का संहार । 
मेरी दैनिक पूजा मे कब कहां और कैसे एक महत्वपूर्ण मंत्र शामिल हो गया शायद मुझे याद भी नहीं......ॐ ह्रीं बगलामुखि ! सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ।.......... मंत्र का महत्व जरूर कभी - कभी सकारात्मक रूप से दिख जाता है पर यह चमत्कार शायद विलक्षण है ।
अभी कुछ दिन पहले ही श्री पितांबरा बगलामुखी सिद्ध पीठ समाज सेवी संगठन द्वारा मेरे विद्यालय सहित अन्य कई विद्यालयो मे झूले लगवाने तथा अन्य बुनियादी सुविधाओ का दिया जाना .... पर आज शाम को गांव के कुछ बच्चो ने विद्यालय के बाहर लगे इस बोर्ड की फोटो भेजी जिसमे शुरुवात पर ही लिखा था मां *पितांबरा की असीम कृपा*........वाकई मेरे लिए भावात्मक थे ।
यह योगदान मां पीतांबरा की असीम कृपा के सिवा और कुछ नही है इसके लिए धन्यवाद करना चाहेंगे डॉक्टर राजेश्वर सिंह विधायक सरोजनी नगर लखनऊ का , जिन्होंने मानव सेवा के धर्म को आगे बढ़ाते हुए छोटे बच्चों के चेहरे मे मुस्कान और खेल के प्रति उनकी स्वाभाविक रुचि को जागृत करने का यह महान प्रयास किया ।
कुछ महीने पहले 10 मई को 1858 की क्रांति दिवस के कार्यक्रम के आयोजन के सिलसिले मे हम झांसी गए थे वहां मां पीतांबरा बगलामुखी स्वरूप के दर्शन हुए । यह मेरे जीवन में माता का दूसरी बार दर्शन था हर बार की तरह अपने नए रूप और कलेवर के साथ माता की आंखें इतनी आकर्षक और करुणामय थी कि अपने दुश्मन के ऊपर प्रहार करते हुए भी ऐसा लग रहा था वह मुझे देख रही है , चितवन तिरछी जरूर थी पर स्पष्ट थी । घंटो मै उनके इस मनोहर दृष्टि को देखती रही , निश्चित रूप से मां के दरबार मे जाकर लोग मन्नत मांगते है पर मै उनके उस सलोने आकर्षक और ममतामई रूप मे खोई हुई थी । मै सोच रही थी कि शायद मां संदेश देना चाहती है कि अपने दुश्मनो का संहार भी इतने प्रेम से और सरल स्वभाव से करो कि उन्हे खंजर की जरूरत ना पड़े ।
मां की आरती हुई पर लगातार कई घंटों तक कई दिशाओं से मां को देखने के बावजूद भी कोविड़ की वजह से कई कपाट बंद थे झरोखे से देखने की परंपरा थी । पर जहां मै खड़ी थी वहां से मां का दर्शन अद्भुत था विलक्षण था मां की आंखे आज भी मुझे याद है वह सजीव थी , वह दया दृष्टि और वह मुस्कुराता हुआ चेहरा । मां ने मोह लिया था मुझे.............. शायद आज तक बाहर नहीं निकल पाई ।
आज मुझे अपार खुशी है कि मेरे विद्यालय के गेट मे एक पत्थर लगाया गया जिस पर लिखा था मां पीतांबरा की असीम कृपा वाकई धन्यवाद के शब्द नही है मनोभाव को प्रकट करने और मां की कृपा का बखान करने के भाव तो बहुत हैं पर कैसे करूं यह नहीं पता ।

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