तकदीर के जद्दोजहद मे किसान

तकदीर के जद्दोजहद मे किसान

सन्त कबीर नगर = चूंकि मान्यता तकदीर की होती है जो भविष्य मे है वही मिलता है लेकिन जब तकदीर की लकीर की बात होती है तब संघर्ष के मायने नजर आते है जिसे अक्सर किसानो की दुनिया मे देखने को मिलती है । किसान कभी उस तकदीर की बात नही करते जिसे जन्म से पूर्व लिखे जाने की मान्यता अक्सर आसमान छूती नजर आती है । ये हमेशा उस कर्म को बल देते है जिसके यकीन के पायदान पर गर्मी , वर्षा और जाड़े की ऋतुये मात खाती है । ऐसे मे क्या सूखा क्या बाढ़ संघर्ष हमारा भविष्य है का जीवंत स्वरूप दिखाया जाता है । ये वही किसान है जो कर्म फल की चिन्ता नही करते उसके स्वरूप को देखते है वरना बाढ़ की चपेट मे पूरी तरह से आ चुके खरीफ के फसलो मे संघर्षो का देदीप्यमान स्वरूप नही देखते । यह और बात हो सकती है कि फसलो के मोती मोमबत्ती की तरह पिघल चुके है या सुरक्षित है । लेकिन भरोसे के पायदान पर वजूद के मोती ढूंढे जा रहे है ।
लिहाजा इसे आप तकदीर का जद्दोजहद आयाम भी कह सकते है और संघर्ष का देदीप्यमान स्वरूप भी कह सकते है ।

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