कभी प्रेम कभी घृणा से काटी जाती है बेटियां = रीना त्रिपाठी
कभी प्रेम कभी घृणा से काटी जाती है बेटियां
हर बार धोखे और विश्वासघात से सहमति और सिसकती है बेटियां
रीना त्रिपाठी
लगभग हर रोज आप पेपर उठाते है तो महिला के शोषण के खबर पढ़ते है , इसी क्रम मे कभी - कभी कुछ ऐसा हो जाता है जो रूह को भी हिला दे , जो आपकी रातो की नींद उड़ा दे और आप चिंतित हो जाएं कि आप उसी समाज मे रहते है जहां रोज जहां एक तरफ किसी न किसी बेटी को या तो प्रेम के नाम पर स्वीकृति न मिलने पर तेजाब डालकर जला दिया जाता है या छत से फेंक दिया जाता है वही दूसरी तरफ़ प्रेम को स्वीकार करने पर , अनचाहे शारीरिक संबंधों के लिए विवश किया जाता है तो कहीं बोटी बोटी काट कर फेंक दिया जाता है । कही बेटियो को प्रेम के जाल मे फंसा कर देह व्यापार की अंधेरी कोठियो मे ढकेल दिया जाता है ।
निश्चित रूप से आप भी सोचते होंगे प्रेम है क्या ? क्या आज के कलयुगी समाज मे प्रेम सिर्फ वासना शारीरिक भोग और बेटियो को खिलौना समझने के सिवा कुछ नही है । प्रेम का कोई पाठ्यक्रम नही बना और न ही परिवारो ने , समाज ने , कभी किसी को प्रेम करने की इजाज़त ही दी , फिर भी यह परंपरा यह भावनात्मक लगाव और खिंचाव सदियो से चला रहा है । खुद को चाहे जाने की तमन्ना रखना , फिर वह महिला हो या पुरुष दोनो के लिए नैसर्गिक प्राकृतिक गुण ईश्वर के द्वारा प्रदान किया गया है ।
अगर सब कुछ सही है तो फिर समस्या कहां है हम सबको सोचना होगा । क्या आज समाज मे नैतिक और व्यवहारिक ज्ञान कुछ ज्यादा ही दिया जा रहा है ?क्या हमने बच्चो मे सभी का खून का रंग लाल है यह पाठ ज्यादा पढ़ा दिया है । जब हम बचपन से हिन्दू मुसलमान , जाति , बिरादरी , ऊंच - नीच अलग - अलग उपजातियां , बच्चो को बताते ही नही तो बाद मे हम उन्हे हिंदू मुसलमान जाति और उपजाति की दुहाई देकर जीवनसाथी चुनने पर बेड़ियां क्यो लगाते है ?
वैश्वीकरण के युग मे हम कितने भी आधुनिक हो जाएं , पश्चिम देशो से लिव इन रिलेशनशिप या कहें सहमति संबंध , या बालिग होते ही शारीरिक संबंध , स्त्री – स्त्री से संबंध पुरुष – पुरुष से संबंध ले तो आए है कुछ रिश्तो को मान्यता भी दे रहे है पर क्या यह भारत की सभ्यता और संस्कृति मे स्वीकार हो पाएगा ? आपका जवाब होगा निश्चित रूप से नही ।
वैश्वीकरण के नाम पर जो खिड़की और दरवाजे हमने खोल रखे है उनमे यदि समय के साथ फिल्टर नही लगाया तो शायद प्रदूषित हवा से हमारा समाज हमारे संस्कार और सभ्यता नष्ट हो जाएंगे । स्वतंत्रता और स्वछंदता का अंतर हमे विद्यालय के स्तर से बच्चो को कराना आज अति आवश्यक हो गया है ।
यदि सामाजिक समस्या आम समस्या होती जा रही है तो निश्चित रूप से इसका समाधान भी हम सबको मिलकर सोचना ही होगा कब तक जन्म से लेकर मृत्यु की शैया तक एक बच्ची , एक युवती , एक महिला प्रताड़ित होती रहेगी............
बस नाम उम्र और जाति अलग हो सकती है ।
यदि प्रेम के नाम पर धोखा विश्वास यह जबरदस्ती प्रेम करने के लिए किसी को दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रताड़ित किया जाता है उस प्रताड़ना को अपराध की श्रेणी तक ले जाया जाता है तो फिर हमारी न्याय व्यवस्था ऐसे लोगो को त्वरित न्याय देते हुए सजा क्यो नही देती क्यो किसी अबला को जिसकी बोटिया काट दी जाती है मरने के बाद भी उसके पेज पर गालियां सुननी पड़ती है । क्यो हर बार रेप होने वाली बच्ची से लेकर युवती को सामाजिक ताने सुनने पड़ते है , कई मामलो मे तो प्रेम के नाम पर अश्लील वीडियो बनाकर बच्ची के माता - पिता को ही भेज दिए जाते है , आप कल्पना करे उस पिता के ऊपर क्या बीती होगी या तो वह अपनी बेटी की हत्या कर दे या खुद फांसी पर लटक जाए एक विचित्र शर्मसार करने वाली मनोदशा परिवारो को झेलनी पड़ती है.......
क्यो हम सरेआम अपराधियो को सजा का प्रावधान नही करते ।
आज होने वाले हर अपराध का क्या कारण सिर्फ और सिर्फ हमारी दंड व्यवस्था ही है , जो कि इतनी शिथिल है कि एक जीवन खत्म होते - होते भी प्रताड़ना सहने वाली युवती को न्याय नही मिलता और समाज भटके हुए युवाओ को यह संदेश जरूर दे जाता है कि अपराध करे बस अच्छा वकील करे आप इज्जत आबरू से समाज मे जी सकते है ।
कब तक सांत्वनाओ का खेल चलता रहेगा ? क्यो हम नागरिक अपनी न्याय व्यवस्था और दंड व्यवस्था को कड़ा करने के लिए एकजुट नही हो पा रहे ।