बढ़ती जनसंख्या और बिलखते हम = रीना त्रिपाठी
बढ़ती जनसंख्या और बिलखते हम
रीना त्रिपाठी
विश्व जनसंख्या दिवस 11 जुलाई को मनाया जाता है । इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस की थीम है लैंगिक समानता की शक्ति को उजागर करना , निश्चित रूप से आपके मन में प्रश्न आएगा यह लैंगिक समानता क्या है ?
लैंगिक समानता का अर्थ यह नही कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति एक लिंग का हो अपितु लैंगिक समानता का सीधा सा अर्थ समाज मे महिला तथा पुरुष के समान अधिकार , स्वतंत्रता , दायित्व तथा रोजगार के अवसरो के परिप्रेक्ष्य मे है । दुनिया की अनंत संभावनाओ को अनलॉक करने के लिए महिलाओ और लड़कियो की आवाज को ऊपर उठाना विश्व जनसंख्या दिवस का मुख्य उद्देश्य है ।
यदि आंकड़ो की बात की जाए तो आज भारत 142.86 करोड़ की जनसंख्या के साथ ही चीन की जनसंख्या 142.57 करोड़ से आगे निकल चुका है भारत 2.9 मिलियन यानी कि 29 लाख के अंतर से चीन से आगे है भारत मे 15 वर्ष से लेकर 64 वर्ष की आबादी की जनसंख्या लगभग 68 प्रतिशत है । निश्चित रूप से एक बहुत बड़े पायदान मे आज हम विश्व कीर्तिमान मे नंबर एक पर खड़े है पर फिर भी खुशी से ज्यादा चिंता की बात है क्यो कि इतनी बड़ी जनसंख्या को अशिक्षा बेरोजगारी भुखमरी और गरीबी से बचा पाना लगभग असंभव सा है ।
ज्यादा आबादी होने पर संसाधनो का वितरण भी अनियमित होगा एक तरफ हम देखते है अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा कुछ चंद मुट्ठी भर लोगो के पास केंद्रित है और ज्यादातर जनसंख्या अपने जीवन के संघर्ष मे पलो मे प्रतिदिन कम आती है और प्रतिदिन खाती है यानी कि निम्न मध्यम वर्ग के हैं या गरीबी की सीमा मे निवास करने वाले लोगों की संख्या इस जनसंख्या मे सर्वाधिक है ।
हम जेंडर इक्वलिटी की बात करते हैं इसके बावजूद घरेलू हिंसा को रोकने मे यह आवश्यक है कि एक मजबूत अर्थव्यवस्था हो महिलाओ की मेंटल हेल्थ अच्छी हो इसके साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य भी अच्छा हो और महिलाओ की शक्ति मे दिन - प्रतिदिन बढ़ोतरी हो हम देखते है घरेलू हिंसा को रोकने के लिए विभिन्न कानून बनने के बावजूद लगभग 16% महिलाएं प्रतिदिन शारीरिक घरेलू हिंसा से 25% महिलाएं यौन रूप से की जाने वाली हिंसा से 53 प्रतिशत महिलाएं मनोवैज्ञानिक मानसिक शोषण से और 56% आम घरेलू मारपीट हिंसा से परेशान रहती है फिर जेंडर इक्वलिटी मे समानता और स्वतंत्रता की बात कहां तक जायज है क्या हम महिलाओ की स्वतंत्रता समानता और दुनिया मे रोजगार की संभावनाओ मे उन्हे सुरक्षित माहौल दे पा रहे है इस बात पर सोचने और चिंतन करने की आवश्यकता है।
आज राजधानी लखनऊ के बंथरा थाना क्षेत्र के अमावा जंगल मे लगभग 25 वर्षीय युवती की दिनदहाड़े रेप करके हत्या कर दी गई । युवती अपने घर से इंटरव्यू देने के लिए निकली थी । गांव के रहने वाले अपराधिक प्रवृत्ति के कुछ लड़को ने उसे अगवा करके उसकी हत्या कर दी जो कि पहले भी हत्या के इल्जाम मे जेल जा चुके है अब प्रश्न यह उठता है कि दिनदहाड़े होती इस हत्या का गुनहगार कौन है ? हमारी कानून व्यवस्था है या अदालत है जो रेप और हत्या के अपराधियो को सहजता से छोड़ देती है या वो कानून व्यवस्था जो ऐसे अपराधियो पर निगरानी नही रख पाई और एक बेकसूर को कुत्सित हिंसा का शिकार होना पड़ा । हमारे फास्ट ट्रैक कोर्ट इतने एक्टिव क्यो नही है कि वह त्वरित न्याय देकर ऐसे अपराधियो को जल्द से जल्द सजा दे ताकि अन्य अपराधी को सजा के डर से नया अपराध करने से डरे ।
आज हम विश्व मे नंबर एक जनसंख्या रखने वाले देश का गौरव प्राप्त कर रहे हैं पर क्या हम अपनी जनसंख्या को नियंत्रित कर पा रहे है क्या हम अपने युवाओ को नियंत्रित विकास दे पा रहे है ? युवा शक्ति की उर्जा का देश के विकास मे उपयोग कर पा रहे है ? हम समानता की बात तो करते है पर स्त्री और पुरुष को समान अधिकार और समान सुरक्षा दे पा रहे है आज भी गांव गली मोहल्ले और शहरों मे रात की बात तो दूर दिन मे भी बेटियां असुरक्षित है असुरक्षा मे एक प्रमुख कारण नशा है । आज नशा सभी के लिए आसानी से उपलब्ध है और हमारा युवा नशे की गिरफ्त मे बहका जा रहा है , नशे और सेक्स की पूर्ति के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है । आज समाज मे हो रहे ज्यादातर अपराधो का मुख्य कारण खोजने पर नशे की लत और नशे के कारण दिमाग मे होते झंझावात और कुत्सित मानसिकता ही निकलती है । जब कोई घटना होती है तब हम न्याय की गुहार लगाते है और इसके बाद होता कुछ नही और हम नई घटना के इंतजार मे शांत होकर बैठ जाते है निश्चित रूप से अब जागना होगा , संभालना होगा और समान नागरिक संहिता , समान जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सभी के लिए समान रूप से लागू करने होंगे ताकि एक नियंत्रित जनसंख्या , नियंत्रित युवा विभिन्न सुविधाओ को प्राप्त कर सकेंगे और समाज मे व्याप्त कुंठित मानसिकता है दूर हो सकेंगे । निश्चित रूप से आज हम कलयुग के चरम पर है और कुंठा तथा विकृत मानसिकता से ग्रसित हर चौथे आदमी से परेशान है काश इस तरह की दिल दहलाने वाली घटनाओ से देश बच सके । हम लैंगिक समानता को तथा समान नागरिक संहिता को समाज मे सम्मानजनक कानूनी मान्यता प्राप्त स्थान दे सके ।