।। भक्ति रस ।। आराधना कभी निष्फल नही होती
।। भक्ति रस ।। आराधना कभी निष्फल नही होती
सन्त कबीर नगर { दुधारा / सुम्हा } आराधना तो कभी निष्फल नही होती फिर जिस भक्त का चित्त उस ईश्वर मे निरन्तर एकांतरूप से लगा रहता है उस भक्त को सांसारिक बंधन भला कैसे बांध सकता है । उक्त बाते श्री मद्भागवत कथा वाचक डां गिरीश त्रिपाठी ने कही । वे आज दूसरे दिन तृतीय स्कन्द के कर्दम प्रजापति और देवहूति प्रसंग का वर्णन कर रहे थे । उन्होंने कहा कि लोक कल्याण की भावना से जिस प्रकार कर्दम प्रजापति जी ने देवहूति से विवाह कर आदर्श जीवन का आधारशिला रखकर सन्यास जीवन को धारण किया । वह मानव जीवन का उत्कृष्ट उदाहरण है । पारिवारिक जीवन से निवृत होकर सन्यास जीवन को धारण करना प्रभु के प्रति अगाध प्रेम का सूचक रहा जो भक्ति का स्वरूप बन गया । तभी तो किसी ने क्या खूब कहा है " क्षण भंगुर जीवन की कलिका कल प्रात को जाने खिली न खिली, मलयाचल की शुचि शीतल मन्द सुगन्ध शरीर मिली न मिली, कहि ले हरि नाम अरि ! रसना, फिर अन्त समय मे हिली न हिली । भक्ति के माहात्म्य मे प्रसंग सुन पूरा पंडाल हरिनाम मय हो गया । योग के लक्षण यमादि से संपन्न देवहूति और कर्दम प्रजापति के विवाह प्रसंग एवं सभी देहधारियो को अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदर का वस्तु होता है किन्तु तुमने मेरी सेवा के आगे उसके क्षीण होने की भी कोई परवाह नही की , अतः अपने धर्म का पालन करते रहने से मुझे तप , समाधि , उपासना और योग के द्वारा जो भय और शोक से रहित भगवतप्रसाद स्वरूप विभूतियां प्राप्त हुई उन पर मेरी सेवा के प्रभाव से अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है के उपदेश से उपस्थित नारी शक्ति आह्लादित हो गई ।
कथा का रसपान कर घर लौट रहे गंगा प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि श्री मद्भागवत कथा जीवन को सार्थक कर ईश्वर के भक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला है ।