शुभकामना

शुभकामना


बहुत 
आसान है , 
छूटी 
मंजिल को, 
फूटी 
तकदीर कहना ।
संघर्षो के 
बिसात को, 
मजबूर कहना ।
कहां होता है 
घर बैठे, 
गिरवर की 
चढ़ाई ।
बुलंदी का 
मुकाम,
उसी की
तकदीर, 
बनती है । 
जिसने
संघर्ष को, 
जीवन की 
तदबीर 
मानी है ।
चलो छोड़ो 
बदनसीबी का 
रोना- धोना, 
देखो 
संघर्षो की 
रवानी ने, 
क्या गुल 
खिला दिया ।
जहां मे 
जहां का, 
दर कदम 
जहां बना दिया ।
चलो आओ 
संघर्षो को, 
उम्दये 
भावनाये दे, 
सफलता के 
बढ़ते 
कदम को,
हार्दिक 
शुभकामनाये दे ।

कवि: जी एल वेदांती

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