सामूहिक सम्मान की कवायद हुई तेज

सामूहिक सम्मान की कवायद हुई तेज 


सन्त कबीर नगर = चूंकि किसी कार्य विशेष के योगदान के साथ कही न कही जिम्मेदारी को और गम्भीर रूप देने की कवायद मे सम्मान की एक विधा काम करती है । प्रतिभा को ध्यान, धारणा, ध्येय के लिए कटिबद्ध करती है । लेकिन बदलते परिवेश मे सम्मान जैसी विधा इस कदर सामूहिक रुप लेने लग गई है जिससे बतौर प्रतिभा विशेष योगदान की क्रिया नजरंदाज हो गई है । खासकर ऐसे तबको के द्वारा जिनकी जिम्मेदारी भी कही न कही प्रभावित होती नजर आती है ।

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